Tuesday, April 16, 2024
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ब्रेन स्ट्रोक होने पर जान बचाने में आसान और बेहद कारगर तकनीक मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी: डॉ. विवेक अग्रवाल

ब्रेन स्ट्रोक से पीड़ित 82 वर्षीय महिला का फोर्टिस मोहाली में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी के माध्यम से सफल इलाज, फोर्टिस मोहाली 24x7 स्ट्रोक-रेडी हॉस्पिटल

शिमला,जून 9: शरीर में सामान्य से विपरीत लक्षण दिखाई देने पर समय पर जांच करवा ली जाए तो बीमारी की असली स्थिति का पता लग जाता है। खास कर दिमाग से जुड़ा हुआ हो तो थोड़ी सी लापरवाही से व्यक्ति ब्रेन स्ट्रोक (दिमाग का दौरा पड़ने के कारण एक जटिल दिमागी बीमारी की चपेट में आ सकता है। आज ब्रेन स्ट्रोक होने पर मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी तकनीक से मरीज को आसानी से बचाया जा सकता है। ब्रेन स्ट्रोक या अधरंग जैसे गंभीर रोग से कैसे बचा जा सकता है इस संबंध में इंटरवेंशनल न्यूरोरेडयोलॉजिस्ट डॉ.विवेक अग्रवाल ने जानकारी देते हुए कहा कि ब्रेन स्ट्रोक या दिमागी दौरा पड़ने पर यदि मरीज को ऐसे अस्पताल पहुंचाया जाए, जहां अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट व न्यूरो सर्जन हों तो अधरंग के असर को कम या खत्म किया जा सकता है।

शिमला में आयोजित कॉन्फ्रेंस में फोर्टिस अस्पताल मोहाली के न्यूरो-इंटरवेंशन एंड इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के कंस्लटेंट डॉ. विवेक अग्रवाल ने कहा कि न्यूरो से संबंधित बीमारियों के लक्ष्ण दिमागी हालत से जुड़े होते हैं, जिनमें भूल जाना, चेतना की कमी, एक दम व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव आना, क्रोधित होना व तनावग्रस्त आदि लक्ष्ण शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यदि न्यूरोलॉजी से संबंधित मरीज का इलाज नहीं करवाया जाता तो इसके गंभीर परिणाम निकल सकते हैं।ऐसे में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी की सहायता से मरीज को जीवनदान दिया जा सकता है। यह बाजुओं और पैरों की नसों से की जाने वाली बेहद सरल तकनीक है जिसमें ब्रेन में हुए क्लॉट को आसानी से निकाल लिया जाता है। उन्होंने कहा कि ब्रेन स्ट्रोक में सबसे महत्वपूर्ण है मरीज को समय पर इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करना। मरीज का स्ट्रोक के 6 घंटे के भीतर इलाज करना बहुत जरूरी है।

डॉ.विवेक अग्रवाल ने बताया कि हाल ही में ब्रेन स्ट्रोक के बाद चार घंटे बाद बेहोशी की हालत में 82 वर्षीय बुजुर्ग मरीज उनके पास पहुंची। उनके शरीर के बाएं हिस्से को लकवा हो गया था। चिकित्सा उपचार में यदि थोड़ी देर हो जाती तो वह महिला मरीज को घातक स्थिति में पहुंचा सकती थी। मरीज के दिमाग के दाहिनी ओर अवरूद्ध हुई रक्त आपूर्ति को मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी की मदद से आर्टरी से क्लाट को हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी को ब्रेन स्ट्रोक के रोगियों के लिए गोल्ड स्टेंडर्ड माना जाता है, वहीं मरीज अब पूरी तरह से स्वस्थ है। उन्होंने कहा कि दिमागी दौरा या लकवा मारने पर बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव आने से गंभीर से गंभीर मरीज स्वस्थ हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि दिमागी दौरे (ब्रेन स्ट्रोक) पड़ने पर मरीज को पूरी तरह से बचाया जा सकता है, बशर्ते उसे ऐसे अस्पताल पहुंचाया जाए, जहां एडवांस स्ट्रोक देखभाल की सुविधाएं उपलब्ध हों, क्योंकि दिमागी दौरे के दौरान मरीज के लिए हर सैकेंड मायने रखता है। उन्होंने कहा कि यदि अस्पताल व्यापक स्ट्रोक सुविधाओं से लैस नहीं है, तो मरीज को ऐसे अस्पताल में पहुंचाना व्यर्थ या समय बर्बाद है। मरीज स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के कारण औसतन स्ट्रोक में हर मिनट 1.9 मिलियन न्यूरॉन्स खो देता है, जो हमेशा अधरंग या मौत
का कारण बनता है।

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