Saturday, May 18, 2024
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जल व्यवस्था के निजीकरण का निर्णय असंवैधानिक और जन विरोधी : संजय चौहान

माकपा ने निजीकरण का विरोध करते हुए निर्णय को तुरंत वापस लेने की उठाई मांग। मांग न माने जाने की स्तिथि पर दी आंदोलन की चेतावनी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) सरकार व नगर निगम शिमला द्वारा शिमला शहर की पेयजल व्यवस्था के निजीकरण के लिए किए जा रहे कार्य का विरोध करती है और जिस प्रकार से सरकार व्यवस्थित तरीके से इसका निजीकरण कर रही है उसकी कड़ी निंदा करती है। पार्टी सरकार से मांग करती है कि सरकार शहर की पेयजल व्यवस्था के निजीकरण के निर्णय को तुरंत वापस ले और इसे पूर्व की भांति नगर निगम को सौंपा जाए क्योंकि 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप पेयजल की व्यवस्था करना नगर निगम का ही उत्तरदायित्व है। यह बात आज माकपा जिला सचिव संजय चौहान ने कही।
भाजपा की नीतियां निजीकरण की पक्षधर:
उन्होंने कहा कि बीजेपी की नीतियां सदा ही मूलभूत सेवाओं पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क आदि के निजीकरण की ही पक्षधर रही है। वर्ष 2012 में भी तत्कालीन बीजेपी की प्रदेश सरकार ने शिमला शहर के पेयजल की व्यवस्था निजी हाथों में देने के लिए टेंडर तक कर दिया था जिसे पूर्व नगर निगम ने अगस्त, 2012 में सदन में प्रस्ताव लाकर निरस्त करवाया था और पेयजल की व्यवस्था नगर निगम शिमला के अधीन ही रखकर इसको सुदृढ़ करने का कार्य किया परंतु वर्ष 2017 में जबसे सरकार व नगर निगम में बीजेपी सत्तासीन हुई है तबसे ही सरकार ने पेयजल की व्यवस्था के निजीकरण के लिए कार्य किया है। पूर्व नगर निगम ने वर्ष 2016 में सरकार से एक लंबे संघर्ष के पश्चात शिमला शहर की पेयजल योजनाओं को नगर निगम के अधीन लेकर इसके  तत्कालीन सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग व शहरी विभाग को सम्मिलित कर एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ग्रेटर शिमला वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज सर्कल का गठन किया था और इसका प्रबंधन नगर निगम शिमला के अधीन ही रखा गया था। इसे विश्व बैंक ने भी मान्य किया था और शहर की सभी पेयजल व सीवरेज परियोजनाएं जिसमें शिमला शहर के लिए पेयजल व्यवस्था के जीर्णोद्धार व सीवरेज व्यवस्था करने के लिए वर्ष 2016 में स्वीकृत विश्व बैंक पोषित 125 मिलियन डॉलर की परियोजनाओं को भी इसी के द्वारा लागू किया जाना था पर वर्ष 2018 में बीजेपी की नगर निगम ने सरकार के दबाव में आकर इस ग्रेटर शिमला वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज सर्कल को समाप्त कर एक कंपनी शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड का गठन किया और पेयजल की व्यवस्था के निजीकरण की नींव रखी गई। सरकार व नगर निगम का यह निर्णय असंवैधानिक और जन विरोधी है क्योंकि एक तो यह नगर निगम के संवैधानिक अधिकारों का हनन है दूसरा जबसे सरकार व नगर निगम ने शहर की पेयजल की व्यवस्था इस कंपनी को सौंपी है तबसे न तो पेयजल व्यवस्था सुचारू रूप से चलाई गई है और न ही समय पर पानी के बिल दिए जा रहे हैं और जो पानी के बिल कंपनी द्वारा दिए जा रहे हैं वह 8-9 महीनों के बिल हजारों व लाखों रुपए के दिए जा रहे हैं। माकपा सचिव ने कहा कि यह
व्यवस्था तर्कसंगत व न्यायउचित नहीं है और जनता इसका विरोध करती आ रही है।
जल के निजीकरण से जनता पर बढ़ेगा अतिरिक्त बोझ:
संजय चौहान ने कहा कि वर्तमान में जिस प्रकार का घटनाक्रम एसजेपीएनएल कंपनी में चलाया जा रहा है वह केवल शहरी विकास मंत्री व जल शक्ति विभाग के मंत्रियों के बीच झगड़े के कारण नहीं है जैसा कि दर्शाया जा रहा है बल्कि सरकार ने अब शिमला शहर के पेयजल व्यवस्था के निजीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी है और सरकार इस कंपनी में जितने भी जल शक्ति विभाग व अन्य विभागों के कर्मचारी कार्यरत हैं उन्हें वापस बुला कर सभी पेयजल योजनाओं को निजी हाथों में सौंपने के लिए तेजी से कार्य कर रही है। इस निजीकरण की प्रक्रिया से जहां निजी कंपनियां मुनाफा कमाएगी वहीं पेयजल की दरों में वृद्धि से आम जनता पर बोझ बढ़ेगा और पेयजल मूलभूत आवश्यकता न रह कर एक उपभोग की वस्तु रह जायेगी। आज तक दुनिया में सरकार द्वारा जहां भी पीने के पानी की व्यवस्था निजी कंपनी को दी गई है वह पूर्णतः विफल रही है और इससे जनता पर केवल आर्थिक बोझ ही बढ़ा है।
करेंगे आंदोलन:
जिला सचिव माकपा संजय चौहान ने कहा कि सीपीएम सरकार की शिमला शहर की पेयजल व्यवस्था के निजीकरण की नीतियों के विरुद्ध जनता को लामबंद कर आंदोलन चलाएगी। यह आंदोलन तब तक चलाया जाएगा जब तक कि सरकार पेयजल व्यवस्था के इस निजीकरण के निर्णय को वापस नहीं लेती और इस कंपनी को निरस्त कर पेयजल की व्यवस्था संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नगर निगम शिमला के अधीन नहीं करती।

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