Sunday, July 3, 2022
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मस्जिदों में अदा हुई बकरीद की नमाज़

एक दूसरे को दी मुबारकबाद , की देश व देशवासियों की सुख-शांति की दुआ

शिमला,21 जुलाई: कोरोना महामारी के कारण तकरीबन डेढ़ साल के बाद शिमला शहर की मस्जिदों में आज पहली बार खुशी के साथ ईद मनाई गई विशेष समुदाय के लोगों ने मस्जिद जाकर ईद की नमाज अदा की और एक दूसरे को मुबारकबाद दी।

ईदगाह शिमला में ईद-उल-जुहा की नमाज अदा करते विशेष समुदाय के लोग

कोरोना नियमों का किया पालन:

इस मौके पर लोगों ने सरकार द्वारा जारी कोरोना नियमों का पालन करते हुए नमाज अदा की। इस त्योहार पर एक दूसरे को गले लगा कर मुबारकबाद देने की परंपरा को न अपनाते हुए नमाजियों ने सामाजिक दूरी का पालन किया और बोल कर ही मुबारकबाद दी।
दिया आपसी प्रेम व भाईचारे का संदेश:
इस अवसर  पर लक्कड़ बाजार ईदगाह के मौलाना मुमताज अहमद ने लोगों को ईद उल जुहा की मुबारकबाद देते हुए लोगों को देश के लिए कुर्बानी, प्रेम,आपसी भाईचारे और सुख शांति का संदेश दिया साथ ही उन्होंने लोगों से कोरोना के नियमों का पालन करने का आग्रह किया। इस शुभअवसर पर उन्होंने समस्त देशवासियों की सुख-शांति कामना करते हुए कोरोना कोरोना महामारी को जल्द से जल्द खत्म होने की दुआ की। मौलाना ने लोगों को ईद उल जुहा मनाए जाने के इतिहास की भी जानकारी दी।
कुर्बानी का प्रतीक ईद-उल-जुहा:
इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक यह इज रमजान के खत्म होने के 2 महीने बाद मनाई जाती है इस दिन आमतौर पर विशेष समुदाय के लोगों द्वारा अल्लाह को बकरे की कुर्बानी दी जाती है इसीलिए इस त्यौहार को बकरीद के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार कुर्बानी के दिन के रूप में याद किया जाता है।
खुदा ने लिया था हजरत इब्राहिम का इम्तिहान:
अल्लाह का बंदा माना जाने वाले हजरत इब्राहिम से यह कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई इस्लामिक धर्म की मान्यताओं के अनुसार एक बार खुदा ने हजरत मोहम्मद साहब का इम्तिहान इम्तिहान लेते हुए आदेश दिया कि वह अपने सबसे अजीब चीज की कुर्बानी दे। खुदा का आदेश मानते हुए हजरत इब्राहिम अपने अजीज बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। बेटे की कुर्बानी देने के समय हजरत ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और जैसे इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे उसी वक्त फरिश्तों से सरदार जिब्रील अमीन ने हजरत इब्राहिम के बेटे को छोरी के नीचे से हटा दिया और उसकी जगह मैंने को रख दिया इस तरह हजरत इब्राहिम के हाथों मैंने के विवाह होने के साथ पहली कुर्बानी हुई उसके बाद जिब्रील अमीन ने हजरत इब्राहिम को खुशखबरी सुनाई कि अल्लाह ने उनकी दी कुर्बानी कबूल कर ली है। उस दिन के बाद से विशेष समुदाय के लोगों में कुर्बानी देने की परंपरा शुरू हुई। खुदा की राह में इब्राहिम द्वारा दी गई इस कुर्बानी को याद करने के तौर पर बकरीद मनाई जाती है और बकरे की कुर्बानी दी जाती है।
प्रथा बांटने की:
प्रथा अनुसार कुर्बानी दिए बकरे के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा गरीबों, दूसरा हिस्सा अपने रिश्तेदारों और तीसरा हिस्सा अपने लिए रखा जाता है।

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